ताकुला (अल्मोड़ा) — रमाकान्त पन्त
इसी रहस्य से कुमाऊं का गण पर्वत भी जुड़ा हुआ माना जाता है। स्थानीय पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां भगवान गणेश के अनादि एवं दिव्य स्वरूप की आराधना से जुड़ी प्राचीन कथा प्रचलित है। गण पर्वत आज भी कुमाऊं की धार्मिक आस्था और पौराणिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
अनादि ‘प्रणव’ (ॐकार) के साक्षात स्वरूप हैं गणाध्यक्ष
स्कंद पुराण के अनुसार, नैमिषारण्य में ऋषियों ने महर्षि व्यास से गणाध्यक्ष की महिमा और उनके पूजन के फल के बारे में पूछा। व्यास जी ने बताया कि मानव जीवन अनेक अदृश्य विघ्नों से घिरा रहता है, जो शुभ संकल्पों और सत्कर्मों में बाधा डालकर उन्हें निष्फल कर सकते हैं।
व्यास जी के अनुसार भगवान गणेश केवल एक देवस्वरूप या पुत्र मात्र नहीं, बल्कि अनादि परब्रह्म और ‘ॐ’ स्वरूप हैं। जिस प्रकार वेद-मंत्रों का आरंभ प्रणव ‘ॐ’ से होता है, उसी प्रकार देव-पूजा की पूर्णता के लिए गणाध्यक्ष श्रीगणेश का स्मरण आवश्यक माना गया है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव ने गण पर्वत पर गणाध्यक्ष के अभिषेक का संकल्प लिया। उनकी आज्ञा से स्कन्दी सरयू का पावन जल लेकर पहुंचे। महादेव के गणों द्वारा पर्वत से प्रवाहित यह दिव्य धारा आगे चलकर ‘गणिका नदी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। स्कंद पुराण में इसे सरयू के समान पुण्यदायिनी बताया गया है।
गणिका नदी के उद्गम पर स्कन्दीसर, जबकि आसपास रिति तीर्थ, काम तीर्थ और गणेश तीर्थ स्थित माने जाते हैं। यहां स्नान, पितृ-तर्पण और श्राद्ध को अत्यंत पुण्यकारी बताया गया है। आगे गणिका और गोत्रजा नदी के संगम पर गणिकेश महादेव विराजमान हैं, जबकि पर्वत की अधित्यका पर माता गिरिजा के वास की मान्यता है।
ताकुला से गणनाथ धाम की ओर जाने वाला मार्ग प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक आस्था से भरपूर है। मान्यता है कि यही वह पावन भूमि है जहां स्वयं महादेव ने गणपति की आदि-सत्ता को नमन कर प्रथम पूज्य गणाध्यक्ष की महिमा और निर्विघ्न जीवन का संदेश दिया।





